Search This Blog

There was an error in this gadget

PostHeaderIcon सच्ची विजय

एक किसान था। वह वर्षो से जमीन को जोतता और खेती करता चला आ रहा था। वह भरपूर मेहनत करता था, लेकिन जो फसल आती थी वह फिर भी उसके लिए नाकाफी होती थी। थक-हार कर एक दिन उसने अपने आप से यह सवाल किया, 'क्यों मैं इतना श्रम किए जा रहा हूं? यह जीवन तो बिल्कुल निरर्थक और नीरस है। आखिर मेरे जीवन की अर्थवत्ता कहां छिपी है?' थोड़ी ही देर बाद एक भिक्षु उसके दरवाजे पर पहुंचा। उसके पास कुछ भी नहीं था, फिर भी वह पूरी तरह संतुष्ट और प्रसन्न दिखाई दे रहा था। वह उससे बहुत प्रभावित हुआ। हर तरह के बोझ से मुक्त भिक्षु का जीवन उसे बहुत ही आकर्षक लग रहा था। उसने तुरंत सोचा कि अब वह भी सभी तरह की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर भिक्षु बन जाएगा। वह घर छोड़ कर दूर चला गया, पर जल्दी ही उसे कुछ खालीपन सा महसूस होने लगा। असल में हल को हमेशा अपने कंधों पर उठाए रखने का वह इतना अभ्यस्त हो गया था कि इसके ब़गैर उसे अपना व्यक्तित्व ही अधूरा लगता था। वह तुरंत घर लौट गया। वहां पहुंच कर उसने फिर से हल उठाया और फिर सोचने लगा कि अब उसे क्या करना है? उसे फेंक देना वह बर्दाश्त नहीं कर सकता था। आखिरकार उसने हल को सहेज कर कहीं अलग छिपा दिया और हलके मन से आगे चल पड़ा। इसके बाद एक सच्चा भिक्षु बनने के लिए जो कुछ भी करने की जरूरत होती है, वह सब उसने किया। फिर भी कई बार उसे अपने हल की याद आ ही जाती थी। तब भाग कर घर जाता। वहां अपने हल को देखकर और उसे झाड़ पोंछ कर फिर मंदिर लौट आता। सात-आठ साल गुजर गए और तब भी वह ऐसा महसूस करता रहा कि जैसे कुछ छूट सा गया हो। आखिरकार एक दिन उसने मन कड़ा कर हल उठाया और उसे एक तालाब में फेंक आया। जैसे ही छपाक की आवाज आई, वह खुशी से उछल पड़ा। चिल्लाया, 'मैं जीत गया! मैं सफल हो गया।' ठीक उसी समय एक सम्राट कोई राज्य जीत कर उधर से लौट रहा था। भिक्षु बन गए किसान की आवाज सुन वह चौंका और उसने पूछा, 'ऐसा क्या जीत लिया तुमने कि खुशी से फूले नहीं समा रहे हो?' 'मैंने अपने भीतर छिपी तमाम दुष्प्रवृत्तियों को जीत लिया। अब मैं हर तरह के भार से मुक्त हो गया।' उसका यह जवाब था। सम्राट ने देखा कि यह तो सचमुच बहुत सुखी और भारमुक्त है। उसने अपने आप से सवाल किया, 'हमने तो युद्ध जीत लिया। एक और राज्य को अपने राज्य में मिला लिया, पर क्या इससे मैं सचमुच सुखी हो सका हूं?' सम्राट ने महसूस किया कि यह तो कोई सच्ची जीत नहीं है। सच्ची विजय तो तभी है जब हम अपने भीतर छिपी दुष्प्रवृत्तियों को जीत लें। उसने राजसी पोशाक उतारे, सेना को मुक्त किया और भिक्षु हो गया।
By:-Deepak Shrivastaava

0 comments: