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PostHeaderIcon वाह इलाहबाद वाह !

अखबार में पढ़ा कि इलाहबाद के कारोबारी बनियों के घर छापे में 80 टन वजन के सिक्के बरामद हुए ! एक इलाहाबादी होने के नाते शर्म से सर झुक गया, पूरे इलाहबाद का नाम "मिट्टी में मिला दिया (शोले स्टाइल में)"! अरे भाई, इलाहबाद की रेपुटेशन का कुछ तो खयाल किया होता। चण्डीगढ़ में एक अधिकारी के घर छापे में तीन कमरे हजार-हजार के नोटों से भरे हुए मिले थे, और तो और, नोयडा में सुखराम के घर से गद्दों में सिले हुए नोट ही नोट मिले थे। अहमदाबाद वालों ने तो घर से बीसियों देशों की करेंसी पकड़वाई थी, और हमारे मुन्ना भाई ने तो हथियारों का शो-रूम ही घर में रखा हुआ था। इन लोगों ने हमारी माया मेम साहब को भी मात कर दिया जो सीबीआई छापे के दौरान कह रही थीं "कि इन लोगों ने एक लाख रुपये जो गरीबों ने माननीय कांशीराम जी के इलाज के लिये जमा किये थे 10 रुपये और 20 रुपये चन्दा करके-उसे भी नहीं छोड़ा"। हमारे इलाहाबादी भाई तो बिलकुल ही गये गुजरे निकले, पुलिस वालों को भी शर्म आई होगी- बरामद भी हुआ तो सिक्कॅ, वो भी पांच पैसे और दस पैसे के सिक्के, कुछ बीस के भी थे।

तो भाई लोग, आगे से ऐसा मत करना कि इलाहबाद वालों को शरमाना पड़े। कम से कम सौ-सौ के नोट तो हों ही ॥

अखबार में छपा समाचार:

छापे में 73 टन सिक्के बरामद : संवाददाता द्वारा, इलाहबाद : कोतवाली पुलिस ने देर रात सिनेमा रोड निवासी दो व्यवसायी के यहां छापा मार कर 165 बोरियों में रखा करीब 73 टन सिक्का बरामद किया। ये सिक्के एक दो और पांच, दस व बीस पैसे के हैं। सिक्कों को कमरे में छुपा कर रखा गया था। पुलिस ने मौके से दो लोगों को पकड़ा है और पूछताछ कर रही है। पुलिस को इस काला बाजारी में बड़े रैकेट की बू आ रही है। देर रात संदिग्ध स्थानों पर पुलिस की छापेमारी जारी थी। एक सौ पैंसठ बोरियों में भर कर रखे गए सिक्कों को बरामद कर थाने लाने में पुलिस के जवानों को पसीना आ गया। इन्हें कमरों से बाहर निकाल कर लाना और इन्हें ठेले रिक्शे पर लाद कर थाने तक ले जाना टेढ़ी खीर थी। सिपाहियों को ही यह काम करना पड़ा। मौके पर सिक्के लादने में जुटे पसीने से लतपथ सिपाहियों की हालत देखने लायक थी। कई तो किनारे हो लिए लेकिन जो मौके पर मिले उन्हें देर रात तक सिक्कों को लादने का काम निपटाना पड़ा। फिर भी देर रात तक सिक्के लादे कर थाने लाए जा रहे थे।

4 comments:

अनिल रघुराज said...

मेरे भाई, बात पते की उठाई। लेकिन इलाहाबाद को इलाहबाद और इलाहाबादी को इल्लाहबदी तो मत लिखिए। क्या आप भी इलाहाबाद की साहित्यिक परंपरा की तौहीन कर रहे हैं।

Deepak Shrivastava said...

अभी ठीक करता हूँ
धन्यवाद्

Shastri JC Philip said...

खबर एवं खबर के सटीक विश्लेषण के लिये आभार -- शास्त्री जे सी फिलिप

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

अनूप शुक्ल said...

इलाहाबादी असल में संतोषी होते हैं इसलिये इतने कम में निपट गये।